Tuesday, October 28, 2008

23rd october opening poem

थक कर शाम जहा हो जाए वही सवेरा होता हैं
दीवानों का कहाँ एक जगह रैन बसेरा होता हैं
मन फैले तो चाँद सितारे अपनी बाहों में भर ले
यदि सिमटे तो घर आँगन में भी तेरा मेरा होता हैं
गीली आंखों के पीछे का दुःख देखो तो पता चले
कोहरा क्यों तालाबो पर इतना घना होता हैं
सूरज डूब गया या निकल गया मुझे क्या करना
मेरे शहर में तेरे बिना अँधेरा ही होता हैं
लाख सम्हालो दिल के पागलखाने को
पर दिल जिसका होता हो उसी का होता हैं
दिल और रूह का रिश्ता कहे क्या होता हैं
माँ से लिपट कर कोई बच्चा रोते रोते सोता हैं

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