Thursday, October 9, 2008

6th ocotober opening poem

नही मिलता अब वो मुझे बीती यादो में
बदल ही गया हैं वो बस चाँद मुलाकातों में
हसरत रही उसे देखने की पास आने की
कोई वजह नही नज़र आती मुझे उसके दूर जाने की
कभी मेरी किताब में उल्टे सीधे चित्र बनता था
आज मेरे बनाये चित्रों को देखता तक नही
कभी मेरे आने पर बारिश में भीगने जाने का प्रोग्राम बनाता था
पर अब बारिश आने पर वो मिलता तक नही
कभी घंटो बैठ मुझे चिठ्ठिया लिखता था
ख़त में हर बात होती थी
यहाँ ये हुआ उसने वो कहा पापा ऐसे डांटते हैं तुम कब आओगे
कभी घंटो बैठ मुझे चिठ्ठिया लिखता था
पर अब मेरी लिखी चिठ्ठिया वो कमबख्त खोलता तक नही
पर जानता हूँ करता हैं वो सब जानकर
मिल सकते नही जिंदगी में हमेशा के लिए
बस इसीलिए बदलना चाहता हैं वो ख़ुद को सबके लिए

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